आखिर क्यों अब कानून को हाथ में लेने लगे हैं बांका जिले के लोग?
बांका : बांका जिले की सड़कों पर कायम अराजकता की वजह क्या है? आखिर क्यों जिले के लोग अब कानून को हाथ में लेने लगे हैं? पुलिस प्रशासन क्यों और किस लिए है? ये कुछ ज्वलंत सवाल इन दिनों बांका जिले के लोगों के दिमाग की नसें निचोड़ रहे हैं. लेकिन इन सवालों का जवाब ढूंढते समय मंथन के दौर में ही दिल की गहराइयों से इनके जवाब भी आप महसूस करेंगे. बांका जिले की सड़कों पर इन दिनों कायम अराजकता और कानून को हाथ में लेने की जिले के लोगों में बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे जिस प्रमुख कारक का हाथ है, वह है.. ओवरलोड मालवाहक वाहनों की बेलगाम स्पीड और उनके चालकों की मनमानी. दरअसल पुलिस के पास इस बड़ी समस्या का फिलहाल कोई हल नहीं दिखता. अगर है भी तो पुलिस हल निकालने की कोशिश क्यों करें! यह स्थिति जिले में पुलिस की अतिरिक्त कमाई का एक बड़ा जरिया बन चुका है, और यही वजह है कि समस्या दिनों दिन यहां विकराल होती जा रही है.
जिले की सड़कों से होकर रोजाना हजारों ओवरलोड ट्रक गुजरते हैं. भले ही इन ट्रकों के मालिक राज्य की सड़कों पर परिचालन के लिए टैक्स भरते हैं, लेकिन यहां इसके लिए पुलिस को उन्हें अतिरिक्त कर चुकाने होते हैं. बालू, ईंट, सीमेंट और दूसरे सामानों से ओवरलोड ट्रक यहां की चिकनी और सपाट सड़कों पर फर्राटे से चलते हैं. उन्हें पुलिस के संरक्षण का भरोसा होता है. वे आबादी वाले हिस्से में भी स्पीड ब्रेक नहीं करते. ऐसे बहुत सारे ट्रकों से अवैध और प्रतिबंधित सामानों की भी ढुलाई होती है. उन्हें भी पुलिस के हाथों में रंग बिरंगे कागज के टुकड़े थमा कर उनकी पहुंच से निकल जाने की जल्दी होती है. सड़कें सिर्फ वाहनों के लिए नहीं आम लोगों के चलने के लिए भी हैं, तो यहां की सड़कों पर लोग भी चलते हैं.
यह बात सही है कि दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों में गलती किसी भी ओर से हो सकती है. लेकिन वाहनों के परिचालन के लिए भी एक लीगल कोड होता है. अधिकतर ड्राइवर इस कोड का पालन नहीं करते. ऐसे में दुर्घटनाएं होती हैं. दुर्घटनाओं में लोगों की मौतें होती हैं. मौतों के बाद जो जनाक्रोश होता है उसके पारा मीटर की सहज कल्पना की जा सकती है. सूचना के बाद भी पुलिस शीघ्रता से मौके पर नहीं पहुंचती. लोगों का आक्रोश और गहरा जाता है. वे अनियंत्रित हो जाते हैं. कुछ उग्र विचार भी सामने आते हैं जो तोड़फोड़ और अराजकता की परिस्थितियों को हवा देते हैं. लोग कानून को अपने हाथ में लेने के लिए तैयार होते हैं. कानून को अपने हाथ में ले भी लेते हैं. हादसों के खिलाफ प्रतिक्रिया में और हादसे हो जाते हैं. बाद में पुलिस पहुंचती है. उन्हें भी ग्रामीणों के आक्रोश का शिकार होना पड़ता है. कई दफा धक्का-मुक्की तो कई बार पथराव से पुलिस का सामना होता है. पुलिस बल प्रयोग करने के लिए विवश होती है. और तभी व्यवस्था और प्रजा के बीच अराजकता पूर्ण स्थिति कायम हो जाती है, जो किसी भी कानून राज की जघन्यतम स्थिति होती है. फिर पुलिस की कार्रवाई शुरु होती है. आम लोग निर्दोष होकर भी पीसे जाते हैं. यही सब कुछ इन दिनों इस जिले में चल रहा है. लेकिन अहम सवाल यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है और आखिर यह कब तक चलेगा? इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है और अगर है भी तो वह अर्धसत्य है...!



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