इंद्रधनुषी सोपान से मंदार शिखर पर अब चढ़ सकेंगे सैलानी
मंदार शिखर दर्शन करने वाले सैलानियों के लिए खुशखबरी है. वे अब इंद्रधनुषी छटा बिखेरती सोपान से चढ़कर मंदार शिखर पर पहुंच पाएंगे. जिलाधिकारी डॉक्टर निलेश देवरे की रचनात्मक सोच और सकारात्मक पहल से यह संभव हो पाया है. मंदार शिखर तक जाने वाली इंद्रधनुषी सोपान को अंतिम रूप दिए जाने पर रात दिन काम चल रहा है. इस अभियान का आरंभिक चरण पूरा हो चुका है. मंदार की तलहटी में पापहरणी के पास से चढ़ने वाली सोपान की इंद्रधनुषी की छटा दूर से ही निखर रही है जिसे निहारते सैलानी न सिर्फ आकर्षित हो रहे हैं बल्कि मंदार शिखर पर चढ़ने का लोभ भी संवरण नहीं कर पा रहे.
ज्ञात हो कि मंदार पर्वत शिखर पर हिंदू एवं जैन धर्मावलंबियों के साथ-साथ सफाहोड़ आदिवासी समुदाय के अनेक प्रसिद्ध पौराणिक मंदिर अवस्थित हैं. मंदार पौराणिक धरोहरों का एक बड़ा आगार है जहां सीता कुंड, शंख कुंड, नरसिंह गुफा, नरसिंह मंदिर, पाताल गंगा के अलावा जगह-जगह देवी देवताओं की प्रतिमाएं, भित्ति चित्र तथा मंदार शिखर पर विष्णुपद मंदिर एवं भगवान वासुपूज्य मंदिर अवस्थित हैं जहां हर वर्ष लाखों सैलानी दर्शन पूजन करने के लिए आते हैं. इन्हें मंदार शिखर पर पहुंचने के लिए जिन प्रस्तर सीढ़ियों का उपयोग करना होता है, वह सैकड़ों साल पुराना है. हालांकि सीढ़ियां यथावत हैं, लेकिन इसकी प्राचीनता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन का निर्माण पाल वंशीय राजाओं के समय में वहां की एक धर्म परायण महारानी कोण देवी के सौजन्य से कराया गया था.
जिलाधिकारी डॉक्टर निलेश देवरे ने बताया कि मंदार दर्शन को लेकर सैलानियों के बढ़ते आकर्षण को देखते हुए उन्होंने इसे और रुचिकर तथा आकर्षक बनाने की दिशा में एक छोटी- सी पहल की है. मंदार शिखर पहुंचने वाले सोपान को इंद्रधनुषी बनाने की योजना इसकी पहली कड़ी है. चार पांच अन्य योजनाओं पर भी काम चल रहा है. उन्हें भी जल्दी अमली जामा पहनाया जाएगा. दरअसल पहल के अभाव में मंदार पर्वत और यहां के पौराणिक धरोहर उपेक्षित हैं. मंदार सोपान को इंद्रधनुषी बनाने में बेहद कम लागत आ रही है. इस तरह के अल्प लागत प्राक्कलन से उनका उत्साह बढ़ा है, जिससे वे इस तरह की कई अन्य योजनाओं पर भी तेजी से काम कर रहे हैं. जल्द ही मंदार नए रूप रंग में सैलानियों के लिए प्रस्तुत होगा.
पौराणिक आख्यानों के मुताबिक सागर मंथन के लिए देवों और असुरों के संयुक्त प्रयास के दौरान मंदार पर्वत को ही मथनी बनाए जाने का उल्लेख है. पौराणिक मान्यता यह भी है कि जब मधु और कैटभ नामक असुरों का आतंक इस धरती पर काफी बढ़ गया तो भगवान विष्णु ने मधु का वध इसी मंदार पर्वत पर किया था. यहां भगवान विष्णु का एक अति प्राचीन मंदिर भी है जिसे विष्णुपद मंदिर कहा जाता है. पास ही बौंसी में भगवान मधुसूदन का भी मंदिर है जो पहले मंदार पर ही हुआ करता था.
लेकिन मुगल काल में बंगाल के क्रूर और आतंकी शासक काला पहाड़ के आक्रमण के समय न सिर्फ मंदार और यहां के पौराणिक धरोहरों को नष्ट किया जाने लगा, बल्कि वे भगवान मधुसूदन की चंद्रमणि पत्थर की मूर्ति भी अपने साथ ले जाने की योजना बनाने लगे. भगवान मधुसूदन की मूर्त्ति को तब स्थानीय पुरोहितों ने बचाकर छिपा दिया और बाद में काला पहाड़ के वापस होने पर उन्हें बौंसी में स्थापित कर दिया. ज्ञात हो कि यही बौंसी प्राचीन काल में वालीसा नगरी के नाम से विख्यात थी. यहां मकर संक्रांति के अवसर पर विशाल मेला लगता है जो दो सप्ताह तक रहता है. मकर संक्रांति के अवसर पर सुप्रसिद्ध स्नान मेला भी मंदार की तराई में स्थित पापहरणी में आयोजित होता है जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं.
--- मनोज उपाध्याय
--- मनोज उपाध्याय

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