इंद्रधनुषी है बौंसी मेले की परंपरा




बौंसी मेला सिर्फ एक आयोजन भर नहीं है बल्कि इस मेले के कई सांस्कृतिक निहितार्थ भी हैं. यह मंदार क्षेत्र की लोक संस्कृति का दर्पण है. इस मेले की परंपरा इंद्रधनुषी रही है. यह परंपरा प्रकारांतर से आज भी कायम है. इस मेले को अंग, बंग और संथाल लोक संस्कृति का संगम भी कहा जाता है. एक ओर जहां सफा आदिवासी मतावलंबी मंदार को अपना सर्वोच्च तीर्थ मानते हैं, वहीं बांग्ला समाज के लिए आचार्य भूपेंद्र नाथ सान्याल की तपोभूमि गुरुधाम एक बड़ा आध्यात्मिक केंद्र है. सनातन धर्मियों के लिए तो मंदार जैसे परम तीर्थ है. भगवान विष्णु के मधुसूदन स्वरूप की यहां पुराण काल से पूजा अर्चना होती रही है. विष्णु और शिव मंदार क्षेत्र के लोगों के आराध्य हैं. इन तीनों ही समाज के लाखों लोगों की एक साथ उपस्थिति और उत्सव का नाम है मकर संक्रांति पर आयोजित होने वाला लोक सांस्कृतिक समारोह बौंसी मेला.



इस मेले के किसी भी भाग में चले जाइए, आपको अंगिका, बांग्ला और संथाली भाषाओं के बोल सुनाई पड़ेंगे. सब के परिधान अलग अलग, भाषा अलग अलग, लेकिन मेले के प्रति उनका लगाव विशिष्ट रुप से समान हो जाता है. मंदार सब के हृदय में है. मेले का आकर्षण भी सब में समान रुप से विद्यमान है. मंदार और मेले में लाई, चूड़ा-दही से लेकर खिचड़ी और फलाहार अंग, बंग और संथाली लोक संस्कृति का ही प्रतिबिंब पेश करता है. इन तीनों ही संस्कृतियों और सामाजिक परंपराओं की खुशबू इस मेले को सुवासित करती है.
यह मेला इस क्षेत्र में लोक जीवन और परंपराओं को चलाने के लिए उपकरणों और संसाधनों का एक बड़ा बाजार भी प्रस्तुत करता है. यही वजह है कि इस मेले में मनोरंजन और खेल तमाशे के साधनों के साथ-साथ कृषि और गृहस्थी में काम आने वाले संसाधनों का एक बड़ा बाजार लगता है. इनकी जमकर खरीद बिक्री होती है. तभी तो प्रशासनिक स्तर पर जहां इस मेले को पहले 21, बाद में 15, फिर 5 और अब 3 दिनों का कर दिया गया है, लेकिन मेला आज भी तीन सप्ताह से ज्यादा कायम रहता है. यह इस मेले के बाजार स्वरूप की वजह से होता है.

-- मनोज उपाध्याय
Post A Comment
  • Blogger Comment using Blogger
  • Facebook Comment using Facebook
  • Disqus Comment using Disqus

No comments :