कम्युनल नहीं, मनोवैज्ञानिक विषयों पर हो पैनल डिस्कशन
विवाद ही अवसाद का कारण होता है, जबकि समझौता इसका निदान. विवाद को समझौते में बदलना ही विवेक है, और यही विवेक मनुष्य को शांति और सौहार्द का वातावरण उपलब्ध कराता है. शांति और सौहार्द मनुष्य की दीर्घायु और सुखी जीवन के लिए नैसर्गिक औषधि है. लेकिन इस स्थापित तथ्य को हम भूलकर नित नए विवादों के जरिए ऊर्ध्वपातन की ओर अग्रसर हैं.
आज जरूरत है मनुष्य को आध्यात्मिक चिंतन की जो प्रेम के पाठ से ही सृजित हो सकता है. जबकि दूसरी और हम कर क्या रहे हैं, इसे बताने की जरूरत नहीं. दिग्भ्रमित मानव समाज धर्म के राजनीतिक पहलुओं को जीवन की सच्चाई मान रहा है. धर्म और कुछ नहीं, अध्यात्म के रास्ते प्रेम की खोज है. लेकिन आज हमारा समाज धर्म के रास्ते दुश्मनी तलाश रहा है. जिस भारतीय वांग्मय ने दुनिया को प्रेम और शांति का पाठ पढ़ाया, आज उसी वांगमय को हम अपने ही देश में विस्मृत करते चले जा रहे हैं. मानव स्वभाव तरल होता है जो हमेशा ऊर्ध्वपातन की ओर अग्रसर होता है. विवेक का बांध ही इसे रोक कर हमें मनुष्य बनाए रखता है.
'हमारे व्यक्तिगत व सामाजिक मूल्य, प्रेम और सौहार्द आज भी जीवित हैं. बस, इन्हें पल्लवित और पुष्पित करने की जरूरत है. टीवी चैनलों और दूसरे मीडिया मंचों पर सांप्रदायिक मुद्दों पर होने वाले पैनल डिस्कशन से सामाजिक जुड़ाव तो होने से रहा. बल्कि इससे मतभेद और भी गहरा रहे हैं. होना तो यह चाहिए कि इसकी जगह मनोवैज्ञानिक विषयों पर पैनल डिस्कशन हो. विद्वानों की राय सुनी जाएं. इससे देश और दुनिया के लोगों में सलीके से जीने के साथ साथ प्रेम, सहिष्णुता, सद्भाव, सौहार्द और क्षमाशीलता की सलाहियत विकसित होगी. यह वैचारिक क्रांति एक बार फिर समाज को देव युग की ओर ले जाएगा'.

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